कली सी हरबार खिलूँ हिंदी कविता | Hindi Poem


तुम तोड़ो मैं कली सी हरबार खिलूँ,

पुष्पकमल सी बनकर मैं भी तुमसे यूँ ही हरबार मिलूँ।

Hindi poem

स्वभाव तुम्हारा कीचड़ से दूर,

मैं कीचड़ में पौधे का निर्माण करूँ।


मैं सृष्टि हूँ कण कण में बसती,

जब चाहूँ रचना जब चाहूँ संहार करूँ।।


लहरों की शांति मैं जब चाहे सुनामी की धार करूँ,

स्थिर धरा में कंपन करूँ,

मैं प्रकृति तुम्हारी सर्वनिर्माता होने की भूल का संहार करूँ।।

- प्रिया मिश्रा भोलू 

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