कौरवन्त हिंदी कविता | Kauravant Poem In Hindi


अपने नेत्र से पट्टी को खोल,

आंखों से लिया टटोल,

जंघा वज्र की ना हों सकी,

लपेटे पत्ते क्यों, लाल मेरे कुछ तो बोल।

Poem

नन्दलाल मिले थे बीच मे बोले गयी तेरी शर्म कहाँ

अंत समय नजदीक हैं कुछ तो कर सुकर्म यहाँ,

नग्न होकर मात के पास में तू जा रहा 

मा और वधू के बीच कुछ तो कर फर्क यहाँ,

हो जा कितना भी वज्र का याद रख ये मर्म रहा

अधर्म और धर्म में विजयी सदा धर्म रहा।


मैं आरंभ हूँ और अंत भी,

मैं घातक हूँ और संत भी,

मैं सृजन हूँ संहार भी,

मैं प्यार हूँ और अहंकार भी।


भीम और दुर्योधन में फिर शुरू वार हुआ,

आग लिए सूर्य में भी घोर अंधकार हुआ,

आदेश पा कृष्ण का भीम ने जब संहार किया,

हाथ जोड़ दुर्योधन बोले ये तो दुर्व्यवहार हुआ।


अधर्म से जीत कर पांडव खिलखिला उठे,

जंघा पर किया वार बलराम तिलमिला उठे,

हर अंग उसका दंग हुआ,

हर रंग उसका भंग हुआ,

अगर -मगर को छोड़कर,

कहर-पहर को मोड़कर,

भगत- जगत को जोड़कर,

पड़ा हुआ "कर" जोड़कर।

अंधकार से निकलकर पैदा एक संत हुआ,

सूर्य के अंधेरे में कौरवों का अंत हुआ।

- नीरज


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