जीवन नौका हिंदी कविता | Hindi Poem


ये धूप छाँव चलती जाएँगी ,

कट फिर फिर फसलें लहराएँगी |

निज जीवन नौका खेते रहना,

ये लहरें आएँगी, जाएँगी ||

Hindi poem

कुछ पल को बदली छाएगी,

रजनी अतिशय गहरायेगी |

झंझावातों की तीव्र हवा,

आशा कण भू पर बिथराएगी ||


पर तुम आगे बढ़ते रहना,

प्रतिमान नए गढ़ते रहना |

निश्चित ही सूरज निकलेगा,

यह तिमिर मोम सा पिघलेगा ||


तेरा जयगान भुवन में छाएगा,

इतिहास तुझे दोहराएगा |

बस सृजन - बीज सेते रहना,

जीवन नौका खेते रहना ||


- अभिषेक पाण्डेय
फतेहपुर, उत्तरप्रदेश

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