माँ कहती है और समझ नहीं आता हिंदी कविता | 2 Hindi Poem


1. "माँ कहती है" हिंदी कविता 

Hindi poem

माँ कहती है,ये लड़का करता क्या है ? 

न जाने ये कभी कुछ कर भी पायेगा या नहीं, 

मैं कहता हूँ माँ सब्र रख ,

मैं वो काम करूँगा 

जो मुझे तरक्की देगा! 

दुनिया को दिख लाऊंगा, 

देख करिश्मा मेरा देख दुनिया भी जश्न मनायेगी! विश्वास नहीं आज तुझे, 

अभी बस नहीं ,इतना सबकुछ तु भी मेरा सहारा बन जाएगी ! 

दुनिया जो मुझ पर हंस रही है, 

वो भी मेरे गीत गाएगी! 


2. "समझ नही आता मैं क्या करु" कविता


समझ नही आता मैं क्या करु

कई बार तो टूट टूट कर बिखर गया हूँ 

 दिल में रख पत्थर हुआ चुर चुर मैं

जड़ से मुल तक हर तरफ भटका हुआ हूँ

हाँ अपनों ने हरेक दर्द दे रहे 

मैं  उन दर्दों से भरे दर्द को समेट कर कहाँ जाऊँ! 

मेरा तो है नही यहाँ , है वो नादान-घटिया बेईमान यहाँ

मैं आज अच्छा, कल को बिगाड़ दिया हुआ हूँ 

अतः मन मार सोचता हूँ मर ही जाऊँ

पता नहीं क्यूँ अहसास हुआ हर बार मुझे

मैं  किसी से दौलत पर मोल लिया हूँ

यहाँ तक कि व्यवहार से कुपुत्र बना हूँ 

मैं अब क्या कहूँ बिगाड़ दिया मुझे मेरे शिल्प कार ने 

अब  मेरी गाथा किसे सुनाऊँ

   

ये मेरे निजी लोगों पर किया गया कटाक्ष है! 

- जितेन्द्र कुमार सरकार

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