असमंजस मन हिंदी कविता | Hindi Poem


कि एक अजीब सी असमंजस मन‌ में ठहरे जा रही है,

मानों किसी बदलाव की ओर इशारा करे जा रही है,

शायद कुदरत अपना हिसाब लेकर बैठी है,

और साल दर साल, महीने दर महीने अपना कर्ज लिये जा रही है,

Hindi poem

उम्मीद की किरण दिखती नहीं पास किसी के,

बस इसी असमंजस की लोह में ये मन की बाती जले जा रही है,

कि चलते वक्त के संग दुनिया ख़ुद से ही बिछड़ती जा रही है,

शायद बदलाव लाने की होड़ में, ख़ुद को ही खोखला करती जा रही है,


मैं ये नहीं कहता की बदलाव लाना-आना गलत है,

पर इस बदलाव के संग मौजूदा इकाईयां थकती जा रही है,

सुनवाई की तारीख उसके यहां भी बस बढ़ती जा रही है,

नतीजा ये‌ है बंधुओं कि खुशियां, प्यार,‌‌ इंसानियत घटती जा रही है,


और अहंकार, दुर्व्यवहार, अपराध‌ जैसी परिस्थितियां बढ़ती जा रही है,

उम्मीद की किरण दिखती नहीं पास किसी के,

बस इसी असमंजस की लोह में ये मन की बाती जले जा रही है।।

- सम्यक जैन

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