"आत्मलहू" हिंदी कविता | Hindi Poem

आंखों के किनारे लाल काले पड़ गये हैं,

इस दौर में दिलों पर भी छाले पड़ गये हैं,

बने बैठे हैं सत्ता के शहंशाह...

वतन की पीड़ा से किनारे कर गये हैं।

Hindi poem

सामाजिक मुद्दे जरूरी हैं, 

गरीब से फिर क्यों ये पीठ कर रहे हैं,

स्वार्थ, सम्मान, पुण्यतिथि पर ही 

बस ट्वीट कर रहे हैं

सत्ता के मालिक हैं आप फिर क्यों ढीठ बन रहें हैं।


ताना नहीं ये पीड़ा है, हर आंख रो रही है,

अपनों को देखें मुस्कुराते, 

हर आंख बाट जोह रही है,

कल देखा रोते मुखिया को, 

जानें चली गईं कितनी और सो रही हैं,

आपने सिर्फ देखा है,

जिन पर बीती उनकी आत्मा रो रही है।


फिर से बन जाइए इतिहास की कोई मिसाल,

बिलखती हुई विनती आपसे जनता कर रही है।

बोस, बिस्मिल, आज़ाद, पटेल 

चाहे गांधी बन जाइए...

ये सब तूफान थे कम से कम आंधी बन जाइए,

बोस, बिस्मिल,आज़ाद...बन जाइए।


जहां जरुरत है संगठन में शक्ति की भी,

अब जरुरत है वहां आसक्ति की भी,

बस एक साथ मिलें क़दम तो 

क्या आन पड़ी फिर गद्दी की भी।


संसद में आप चंद हो

धड़कने हमारी मंद हो

"आत्मलहू" बह उठा ममता के ह्रदय का...

जवान बेटा जिसका कफ़न में बंद हो।

कई दौर पड़े इतिहास में, 

ये इतिहास के पन्ने बंद हों

अब भावी पीढ़ी आएगी,

गर याद विवेकानंद हों

तलवार में जोर अब भी हैं, 

पर क़ायम एक मिसाल हो,

क़लम अंगार बन चली, 

अब हथियारी कारोबार बंद हो 

संसद में आप चंद हो...।


सर्वोपरि जो बना बैठी, 

ये जनता ज़रा अंधी है,

जो हित में नहीं लोकतंत्र के, 

वो सरकार अति गंदी है 

इनके शब्दों में है सांत्वना, 

कर्तव्य में सत्ता मंदी है,

जो हित में नहीं लोकतंत्र के 

वो सरकार अति गंदी है।


राजनीति से अपनी ये रचना इतिहास चाहते हैं,

कल के आसरे में आज का विनाश चाहते हैं,

भविष्य में भावी उड़ सके हम 

ऐसा विकास चाहते हैं,

राजनीति से अपनी ये रचना इतिहास चाहते हैं...।


किसी तो एक निर्णय पर रुक जाइए,

जनार्दन से आप हैं, इसके आगे झुक जाइए,

"भारत" वतन में जन्मे हो, 

तनिक तो विनमृता लाइए,

नहीं बर्दाश्त गर चीख पीड़ की, 

जाके पाक में रुक जाइए ।

- नीरज

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