उर्दू शायरी और ग़ज़ल की दुनिया में "राहत इंदौरी (Rahat Indori)" का नाम बड़ा जाना पहचाना नाम है। इस आधुनिक युग में इनकी शायरी और गज़लों ने युवाओं के दिल में आज भी दस्तक दे रखी है। जहां देखो सोशल नेटवर्किंग प्लेटफॉर्म पर इनकी शायरी जरूर सुनने को मिलती है। ऐसे में शायरी लिखने वाले शायर के दिमाग में ये प्रश्न आता है "राहत इंदौरी किस बहर में शायरी और ग़ज़ल लिखते थे"। इसीलिए आज हम "Rahat Indori Shayari Or Ghazal Bahar Analysis" आपके सामने लेकर आये हैं।

Rahat indori ghazal

दोस्तों, ग़ज़ल की तख़्ती करना अगर आपको आता है, तो आप आसानी से ग़ज़ल की बहर पता कर सकते हैं। वैसे ये जरूरी नहीं कि कोई ग़ज़लकार या शायर एक ही बहर में लिखें। प्रचलित बहर में कई बहर पर राहत साहब ने गज़लों को लिखा है। आइए, राहत इंदौरी साहब की कुछ गज़लों का विश्लेषण करके देखते हैं कि वो किस बहर में लिखी गई है।

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1. राहत इंदौरी ग़ज़ल "आँख में पानी रखो"

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आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो,
ज़िंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो।

एक ही नद्दी के हैं ये दो किनारे दोस्तो,
दोस्ताना ज़िंदगी से मौत से यारी रखो।

राह के पत्थर से बढ़ कर कुछ नहीं हैं मंज़िलें,
रास्ते आवाज़ देते हैं सफ़र जारी रखो।

ये ज़रूरी है कि आँखों का भरम क़ाएम रहे,
नींद रखो या न रखो ख़्वाब मेयारी रखो।

आते जाते पल ये कहते हैं हमारे कान में,
कूच का ऐलान होने को है तय्यारी रखो।

ये हवाएँ उड़ न जाएँ ले के काग़ज़ का बदन,
दोस्तो मुझ पर कोई पत्थर ज़रा भारी रखो।

ले तो आए शाइरी बाज़ार में "राहत" मियाँ,
क्या ज़रूरी है कि लहजे को भी बाज़ारी रखो।

इसी प्रकार नीचे दी गई ग़ज़ल भी इसी बहर के मात्रिक विन्यास पर लिखी गई है।

2. राहत इंदौरी ग़ज़ल "सिर्फ खंज़र ही नहीं"

सिर्फ़ ख़ंजर ही नहीं आँखों में पानी चाहिए,
ऐ ख़ुदा दुश्मन भी मुझ को ख़ानदानी चाहिए।

शहर की सारी अलिफ़-लैलाएँ बूढ़ी हो चुकीं,
शाहज़ादे को कोई ताज़ा कहानी चाहिए।

3. राहत इंदौरी ग़ज़ल "न हम-सफ़र न किसी हम-नशीं से"

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न हम-सफ़र न किसी हम-नशीं से निकलेगा,
हमारे पाँव का काँटा हमीं से निकलेगा।

मैं जानता था कि ज़हरीला साँप बन बन कर,
तिरा ख़ुलूस मिरी आस्तीं से निकलेगा।

इसी गली में वो भूका फ़क़ीर रहता था,
तलाश कीजे ख़ज़ाना यहीं से निकलेगा।

बुज़ुर्ग कहते थे इक वक़्त आएगा जिस दिन,
जहाँ पे डूबेगा सूरज वहीं से निकलेगा।

गुज़िश्ता साल के ज़ख़्मो हरे-भरे रहना,
जुलूस अब के बरस भी यहीं से निकलेगा।

इसी प्रकार नीचे दी गई ग़ज़ल भी इसी बहर के मात्रिक विन्यास पर लिखी गई है।

4. राहत इंदौरी ग़ज़ल "दिलों में आग लबों पर गुलाब"

दिलों में आग लबों पर गुलाब रखते हैं,
सब अपने चेहरों पे दोहरी नक़ाब रखते हैं।

हमें चराग़ समझ कर बुझा न पाओगे,
हम अपने घर में कई आफ़्ताब रखते हैं।


5. राहत इंदौरी ग़ज़ल "बुलाती है मगर जाने का नइ"

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बुलाती है मगर जाने का नइ,
वो दुनिया है उधर जाने का नइ।

ज़मीं रखना पड़े सर पर तो रक्खो,
चलो हो तो ठहर जाने का नइ।

है दुनिया छोड़ना मंज़ूर लेकिन,
वतन को छोड़ कर जाने का नइ।

जनाज़े ही जनाज़े हैं सड़क पर,
अभी माहौल मर जाने का नइ।

सितारे नोच कर ले जाऊँगा,
मैं ख़ाली हाथ घर जाने का नइ।

तो राहत इंदौरी साहब की कुछ गज़लें पढ़कर आपको ये मालूम चल गया होगा कि वो किस बहर में है। आपको "राहत इंदौरी किस बहर में शायरी और ग़ज़ल लिखते थे" ये मालूम चल गया होगा। हमने इस पोस्ट में "Rahat Indori Shayari Or Ghazal Bahar Analysis" के द्वारा आपको समझाने की कोशिश की।

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