आज का Hindi Urdu Word श्रृंखला में शब्द है "ज़ोफ़"। इसका प्रयोग "मिर्ज़ा ग़ालिब (Mirza Ghalib) की ग़ज़ल में भी किया गया है। ज़ोफ़ शब्द का अर्थ बुढ़ापा या कमज़ोरी होता है। चलिए अब एक नज़र Mirza Ghalib की Urdu Ghazal की ओर नज़र डालते हैं।

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Mirza Ghalib Ghazal In Urdu


मेहरबाँ हो के बुला लो मुझे चाहो जिस वक़्त,

मैं गया वक़्त नहीं हूँ कि फिर आ भी न सकूँ।


Meharban Hoke Bula Lo Mujhe Chaho Jis Waqt,

Main Gaya Waqt Nahi Hun Ki Fir Aa Bhi Na Saku.


ज़ोफ़ में ताना-ए-अग़्यार का शिकवा क्या है,

बात कुछ सर तो नहीं है कि उठा भी न सकूँ।


Zof Me Tana-E-Agyar Ka Shikva Kya Hai,

Bat Kuch Sar To Nahi Hai Ki Utha Bhi Na Saku.


ज़हर मिलता ही नहीं मुझ को सितमगर वरना,

क्या क़सम है तिरे मिलने की कि खा भी न सकूँ।


Zahar Milta Hi Nahi Mujhko Sitamgar Warna,

Kya Kasam Hai Tere Milne Ki Ki Kha Bhi Na Saku.


इस क़दर ज़ब्त कहाँ है कभी आ भी न सकूँ,

सितम इतना तो न कीजे कि उठा भी न सकूँ।


Es Kadar Jabt Kahan Hai Kabhi Aa Bhi Na Saku,

Sitam Etna To Na Kije Ki Utha Bhi Na Saku.


लग गई आग अगर घर को तो अंदेशा क्या,

शोला-ए-दिल तो नहीं है कि बुझा भी न सकूँ।


Lag Gayi Aag Agar Ghar Ko To Andesha Kya,

Shola-E-Dil To Nahi Hai Ki Bujha Bhi Na Saku.


तुम न आओगे तो मरने की हैं सौ तदबीरें,

मौत कुछ तुम तो नहीं हो कि बुला भी न सकूँ।


Tum Na Aaoge To Marne Ki Hain Sau Tadbeeren,

Maut Kuch Tum To Nahi Ho Ki Bula Bhi Na Saku.


हँस के बुलवाइए मिट जाएगा सब दिल का गिला,

क्या तसव्वुर है तुम्हारा कि मिटा भी न सकूँ।


Hanske Bulwaiye Mit Jayega Sab Dil Ka Gila,

Kya Tasavvur Hai Tumhara Ki Mita Bhi Na Saku.

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Conclusion :- आज Hindi Urdu Words में हमने "ज़ोफ़" का अर्थ और इसका प्रयोग मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़ल (Mirza Ghalib Ghazal) में बताया। ऐसे ही Urdu Words Daily हमारी वेबसाइट पर पढ़ते रहें और Share भी करते रहे।

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