नए शायर और गज़लकार का अक्सर ये प्रश्न रहता है "गुलज़ार किस बहर में गज़ल और शायरी लिखते थे"। अगर आप भी गज़ल लिखने के शौकिन हैं, तो इस पोस्ट को जरूर पढें। "गुलज़ार की गज़लके कुछ उदाहरण देकर हम समझेंगे कि गुलज़ार ने किन-किन बहर में गज़ल को लिखा है। इस पोस्ट में आगे बढ़ने से पहले आपसे एक निवेदन है कि आप ऐसे ही कंटेंट पढ़ने के लिए वेबसाइट के नोटिफेशन को ऑन जरूर कर लें।

Gulzar shayari

गुलज़ार की शायरी और गज़ल किस बहर में है

दोस्तों, मैंने बहर पर और गज़ल कैसे लिखें, इस विषय पर तमाम लेख साझा कर रखे हैं। लेकिन आए दिन यही प्रश्न ज्यादा पूछा जा रहा है, गुलज़ार साहब किस बहर में गज़ल लिखते थे, ये बताइए। कई रचनाकार ये सोच रहे होंगे कि "बहर क्या है," तो पहले आप हमारे बहर वाले लेख को जरूर पढ़ लें। दोस्तों, गुलज़ार साहब ने कई बहर पर गज़ल लिखी है। ऐसे में किसी एक बहर का नाम लेना सही नहीं होगा। क्योंकि जरूरी नहीं कि कोई गज़लकार एक ही बहर पर लिखें। हालांकि, आपको ऐसे कई गज़लकार मिल जाएंगे, जिनकी पकड़ एक बहर पर रहती है और पूरे जीवन में वो उसी बहर पर लिखते हैं।

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गुलज़ार साहब ने कई बहर पर पकड़ बनाई। इन बहर के जरिए उन्होंने कई बाॅलीवुड फिल्मों में गीत भी लिखें। चलिए, गुलज़ार साहब की कुछ गज़ल के आधार पर हम बहर समझ लेते हैं। ताकि आप ये समझ पाएं कि उन्होंने किन बहर पर कौनसी गज़ल लिखी है।

1. गुलज़ार की गज़ल "कोई अटका हुआ है पल शायद"

कोई अटका हुआ है पल शायद,
वक़्त में पड़ गया है बल शायद।

Koi Atka Hua Hai Pal Shayad,

Waqt Me Pad Gaya Hai Bal Shayad.

दिल अगर है तो दर्द भी होगा,
इसका कोई नहीं है हल शायद।

Dil Agar Hai To Dard Bhi Hoga,

Iska Koi Nahi Hai Hal Shayad.

लब पे आई मिरी ग़ज़ल शायद,
वो अकेले हैं आज-कल शायद।

Lab Pe Aayi Meri Ghazal Shayad,

Wo Akele Hain Aajkal Shayad.

जानते हैं सवाब-ए-रहम-ओ-करम,
उनसे होता नहीं अमल शायद।

Jante Hain Sabab-E-Raham-O-Karam,

Unse Hota Nahi Amal Shayad.

आ रही है जो चाप क़दमों की,
खिल रहे हैं कहीं कँवल शायद।

Aa Rahi Hai Jo chap Kadamo Ki,

Khil Rahe Hain Kahin Kanwal Shayad.

राख को भी कुरेद कर देखो,
अभी जलता हो कोई पल शायद।

Rakh Ko Bhi KuredKar Dekho,

Abhi Jalta Ho Koi Pal Shayad.

चाँद डूबे तो चाँद ही निकले,
आपके पास होगा हल शायद।

Chand Dube To Chand Hi Nikale,

Aapke Pas Hoga Hal Shayad.

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दोस्तों, मैं आपको कई बार बता चूका हूं कि अगर आप बहर का पता करना चाहते हैं, तो सबसे पहले प्रचलित "गज़ल की 32 बहर की सूचि" खोल लें। उसके बाद आप किसी भी गज़लकार की गज़ल को पढ़े। ध्यान रहे अगर आपको मात्रा गणना करना नहीं आता, तो फिर भूल जाएं कि ये आपके बस की बात नहीं है। मात्रा गणना की जानकारी होने के बाद जब आप किसी गज़ल के मिसरे पढ़ते हैं, तो हो सकता है "मात्रा गिराने की छूट" का प्रयोग होने से कई मिसरों की तक्ती‘अ आप नहीं कर पाए। ऐसे में आपको घबराना नहीं है आपको सारे मिसरों को देखना है कोई एक मिसरा ऐसा जरूर होगा जिससे आप उस बहर का पता लगा पाएंगे। जैसे गुलज़ार साहब की जो गज़ल हमने बताई उसके प्रारंभिक शे‘र यानि मतले से आप बहर को नहीं पता कर पाएंगे। लेकिन थोड़ा आगे आप पढ़ते जाएंगे, तो एक मिसरा आपको मिलेगा - "लब पे आई मिरी गज़ल शायद"। इस मिसरे की गणना से ये मात्राएं निकलती है-

2222 1212 22

जब आप प्रचलित बहरों की सूचि देखेंगे, तो आपको ऐसी कोई बहर नहीं मिलेगी। लेकिन एक बहर मिलेगी जो "2122 1212 22" होगी। दोस्तों, सही मायने में यही मात्रिक क्रम वाली बहर इस गज़ल में प्रयोग हुई है। अब आप सोच रहे होंगे कि इस मिसरे में "पे" शब्द आया है और इसकी मात्रा 2 हो रही है फिर कैसे इसे 1 माना जा रहा है। ऐसे में दोस्तों, मैं बताना चाहूंगा यहां मात्रा गिराने की छूट का प्रयोग किया गया है। अगर आप नहीं जानते कि "मात्रा गिराने का नियम क्या है," तो हमारे इस लेख को भी जरूर पढ़ लें। तो दोस्तों, गुलज़ार साहब की अधिकतर गज़लें इसी बहर के मीटर पर आधारित होती है। लेकिन कुछ और बहर भी है जिसके बारें में हम आगे जान रहे हैं।

इसी प्रकार गुलज़ार साहब की कुछ गज़ल की बहर में नीचे बता रहा हूं। आप इसी अनुसार पता कर सकते हैं, जैसे मैंने आपको बताया।

2. गुलज़ार की गज़ल "ऐसा खामोश तो मंजर"

गज़ल में बहर का मात्रिक विन्यास -
2122 1122 1122 22
 

ऐसा ख़ामोश तो मंज़र न फ़ना का होता,
मेरी तस्वीर भी गिरती तो छनाका होता।

Aisa Khamosh To Manzar Na Fana Ka Hota,

Meri Tasveer Bhi Girti To Chhanaka Hota.

यूँ भी इक बार तो होता कि समंदर बहता,
कोई एहसास तो दरिया की अना का होता।

Yun Bhi Ek Bar To Hota Ki Samandar Bahta,

Koi Ahsas To Dariya Ki Ana Ka Hota.

साँस मौसम की भी कुछ देर को चलने लगती,
कोई झोंका तिरी पलकों की हवा का होता।

Sans Mausam Ki Bhi Kuch Der Ko Chalane Lagti,

Koi Jhonka Teri Palakon Ki Hawa Ka Hota.

काँच के पार तिरे हाथ नज़र आते हैं,
काश ख़ुशबू की तरह रंग हिना का होता।

Kanch Ke Par Tere Hath Nazar Aate Hain,

Kash Khushbu Ki Tarah Rang Heena Ka Hota.

क्यूँ मिरी शक्ल पहन लेता है छुपने के लिए,
एक चेहरा कोई अपना भी ख़ुदा का होता।

Kyun Meri Shakl Pahan Leta Hai Chhupane Ke Liye,

Ek Chehara Koi Apna Bhi Khuda Ka Hota.


3. गुलज़ार की गज़ल "खुली किताब के"

इस गज़ल में बहर का मात्रिक विन्यास -
1212 1122 1212 22

खुली किताब के सफ़्हे उलटते रहते हैं,
हवा चले न चले दिन पलटते रहते हैं।

Khuli Kitab Ke Safhe Ulatte Rahte Hain,

Hawa Chale Na Chale Din Palatte Rahte Hain.

बस एक वहशत-ए-मंज़िल है और कुछ भी नहीं,
कि चंद सीढ़ियाँ चढ़ते उतरते रहते हैं।

Bas Ek Wahshat-E-Manzil Hai Or Kuch Bhi Nahi,

Ki Chand Sidhiyan Chadhte Utarte Rahte Hain.

मुझे तो रोज़ कसौटी पे दर्द कसता है,
कि जाँ से जिस्म के बख़िये उधड़ते रहते हैं।

Mujhe To Roz Kasauti Pe Dard Kasta Hai,

Ki Jaan Se Jism Ke Bakhiye Udhadte Rahte Hain.

कभी रुका नहीं कोई मक़ाम-ए-सहरा में,
कि टीले पाँव-तले से सरकते रहते हैं।

Kabhi Ruka Nahi Koi Makam-E-Sahra Me,

Ki Tile Panv-Tale Se Sarakte Rahte Hain.

ये रोटियाँ हैं ये सिक्के हैं और दाएरे हैं,
ये एक दूजे को दिन भर पकड़ते रहते हैं।

Ye Rotiyan Hai Ye Sikke Hain Or Dayre Hain,

Ye Ek Duje Ko Din Bhar Pakadte Rahte Hain.

भरे हैं रात के रेज़े कुछ ऐसे आँखों में,
उजाला हो तो हम आँखें झपकते रहते हैं।

Bhare Hain Rat Ke Reze Kuch Aise Aankho Me,

Ujala Ho To Hum Aankhe Jhapakate Rahte Hain.

Conclusion :- तो आप सभी रचनाकार को इन गज़लों से समझ आया होगा "गुलज़ार किस बहर में शायरी और ग़ज़ल लिखते थे"। हमने आपको 3 गज़लों के उदाहरण देकर विस्तृत बताया। उम्मीद है इतनी गहराई से ये जानकारी जानने के बाद आपके प्रश्न का जवाब आपको मिल पाया होगा।

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