एक एक ने सीना तानकर उनके वार को झेला है,
रण भूमि में हर सैनिक ये खेल जान से खेला है,
अपने घर को भूल गए जब दुश्मन ने ललकारा था,
क्योंकि हमको अपना हिंदुस्तान बचाना सारा था,
यही कफ़न है तेरा ऐसा दुश्मन मुझसे कह गया है,
सुन लो मेरे देशवासियों हाथ तिरंगा रह गया है।

Shahid par kavita

सरहद पार के दुश्मन की गुस्ताखी अब भी रुकी नहीं है,
हर पल हम में और बढ़ रही आग बदले की बुझी नहीं है,
हमने सौगंध ली क्योंकि यारों की राख उठाई थी,
बर्दाश्त नहीं हो पाया था दुश्मन ने आंख उठाई थी,
बुलन्द इरादे हैं खड़े बस जिस्म बेचारा ढह गया है,
सुन लो मेरे देशवासियों हाथ तिरंगा रह गया है।

सांसे थोड़ी चल रही पर कुछ ही शेष बची है अब,
मैं हाल सामने देख रहा हूँ यार चल दिये सब,
सुनसान हो गया बिल्कुल लाशें उनकी जैसे सो रही है,
ऐसा लगता मानो धरती लिए गोद में रो रही है,
सांस आखिरी चल रही है खून बदन से बह गया है,
सुन लो मेरे देशवासियों हाथ तिरंगा रह गया है।

- कवि योगेन्द्र "यश"

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