पिता पर कविता - आप दादा बन गए 

आज भी आपको बहुत miss करता हूँ हर वक़्त,
न चाहते हुए भी बनना पड़ता है सख़्त,
फिर भी आखिर आंसू बह ही जाते हैं पापा,
मां का हाल देख कर लब कुछ कह ही जाते हैं पापा,
नया मेहमान आया है घर में लेकिन आपकी कमी सी है,
पता नहीं क्यों खुशी के वक़्त में भी आंख में नमीं सी है,
अब कैसे मिलेगा उसे दादा का दुलार वो प्यार,
बताओ कौन ले जाएगा उसे घुमाने बाजार,
उसकी छोटी छोटी उंगलियां जैसे आपका हाथ थामने को बेकरार है,
चल नहीं सकती पर मानो आपके साथ चलने को अभी से तैयार है,



आंखें मानो उसकी आपको ढूंढ रही है कहीं,
और मानो मुझे रोके कह रही कि वो दिखते क्यों नहीं,
हां, पापा काश आप होते वो आपकी गोद में होती,
उसके पापा के पास जाने से पहले वो आपके पास आने को रोती,
पर तक़लीफ़ खाये जा रही है कि क्या कहूंगा उसे,
जब कहेगी दादा को बुलाओ तो कैसे रखूंगा उसे,

Father poem

मेरे बहते हुए ख्वाब सारे मर्यादा बन गए,
आज लगा आपकी कमी से मेरे कर्तव्य ज्यादा बन गए,
पापा मैं ये नहीं कहूंगा कि मैं पापा बन गया,
बल्कि खुशी इसमें है कि आप दादा बन गए।

- कवि योगेन्द्र "यश" पापा का बेटा

1 Comments

  1. अब कैसे मिलेगा उसे दादा का दुलार,
    बाप की डॉट से बचने वाला प्यार
    कंधे में चड़ने वाला यार,
    बताओ कौन ले जाएगा उसे घुमाने बाजार,

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