कविता- रहस्य ज़िंदगी का

बदल जाती है अक्सर होसलो कि गवाहियां,
ज़िंदगी लाती है तभी मिलाने हमसे तवाहियां,
रुख मोड़ लिया करते है हमारे अपने,
जब हद से गुज़र जाती है हमारी खामोशियाँ।


ये उलझन नही ना मेरी बहस है,
ये तो ज़िंदगी का कठोर रहस्य है,
कोई भी वादा इतना पक्का नही,
जो तेरी जुवा को बाँध सके,
फिसल जाते है शब्द आखिर,
जब तू अपने होश खो चुके।

ये व्यथा नही हकीकत ना असमंजस है,
ये तो ज़िंदगी का कठोर रहस्य है।

- Himanshu kumar

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