कविता मैं उड़ना चाहती हूं

"पंख पाये है मैंने,
उडना भी चाहती हूं
पर ऊँचाई देख
आखिर क्यों डर जाती हूँ।


सपने कुछ बोये है मैंने
जीना उन्हें चाहती हूं
पर सपने टूट जाने का डर
कभी भुल ना पाती हूँ।

पता है कि राह में काँटे बहुत है
पर फिर भी चलना चाहती हूं
डगमगा ना जाये ये पैर मेरे
ये सोच, हमेशा रुक - सी जाती हूँ।

पर अब हौसला अपना जगाकर
आगे बढना मैं चाहती हूं
कल कुछ भी हो अब तो
पंख पाये है आखिर मैंने
अब तो उडना मैं चाहती हूँ।"

- पूजा बैरवा

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