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Thursday, 18 October 2018

दशहरे पर कविता || dussehra poem in hindi

दशहरे पर कविता || dussehra poem in hindi

बढ़ रहा अपराध यहां पर सब लगे हैं मस्ती में,
सज्जन दिखते हैं नहीं सब दुर्जन दिखते बस्ती में,

देखो जग में काले कर्मों का स्थान बना है,
सत्कर्म का युग था सारा आज सुनसान बना है,

dussehra poem

जहां देखता हूँ वहां पर आज दरिंदा दिखता है,
कोई हत्यारा झूठ के दम पे जग में जिंदा दिखता है,

कई नक़ाब है चेहरे पर पहचान हुई है मुश्किल,
जीना मुश्किल हो गया है भरी पड़ी है महफ़िल,

जब मन भटका है तो सोचलो दृष्टि का क्या होगा,
कलयुग में रावण है इतने सृष्टि का क्या होगा।

- कवि योगेन्द्र जीनगर "यश"

1 comment:

  1. Me ik raper hu.
    Mene do songs likhe Hai.
    Lekin mere dono songs.
    Ek jaise Hai.
    Me chata hu sir ki mere dono na sahi.
    Mera ek rap shyri jaisa bane.
    Sir mene apni life Me bhot jayda Time waste kiya Hai.
    Or ab me piche nhi jana chata.
    Mere gharwale bhi mujhe support nhi karte.
    Mujhe Sir itna bta dijiye me apni likhai kaise improve karu. Apki ati kirpa hogi.
    Sir me apko shirminda nhi karna chata
    Apki jo bhi fee Hai mei dene ke liye taiyar hu

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