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Tuesday, 30 October 2018

पथ न छोड़ कविता

पथ न छोड़ कविता

मानता मोहक महि में , मुग्ध मानुष मन में खोट ।
तू संभलजा मन न भटका ,सत्यता का पथ न छोड़ ।।


पहन ले सत्यावरण , मिथ्यावरण दूर हो।
तप जा सत्यानल से तू, रणवीर तू रणशूर हो ।।
संग्राम तेरा सत्यता का,सत्य का उद्घोष बोल ।
तू संभलजा मन न भटका, सत्यता का पथ न छोड़ ।।

झंझरक मे छल झलकता ,तू झर्झरी की झलक बोल ।
खंजक नहीं खंजर नहीं ,खगकेतु बनके जग में डोल ।।
खचित खच करले तु जग को,खं से तू खग सा तू लोट।
तू संभलजा मन न भटका, सत्यता का पथ न छोड़ ।।

तू अकेला डट के चलना,अन्जुली में अब्ध घोल।
डमरु ढक्कन अब बजा तू,अब बजा सत्या का ढोल ।।
भूल जा बंटवारा जग में ,तू अहिंसा मार्ग खोल ।
तू संभलजा मन न भटका ,सत्यता का पथ न छोड़ ।।


लडकते कदमों को अपने ,  पाप हिंसा से बचा ।
छद्म छद छद्यावरण को,क्षण छटाभा से जगा।।
चमन चमके चाँद सा तू,ऐसी चांदनी आ के लोट ।
तू संभलजा मन न भटका ,सत्यता का पथ न छोड़ ।।

कलिधरा भी  दीप्त होगी ,मन में सत्यता की डोर ।
सिंह -मृग में मैत्री भाव ,जल पियेंगे एक ही छोर ।।
जग को जग से यूं मिला, जंजीर की जैसी हो जोड ।
तू संभलजा मन न भटका ,सत्यता का पथ न छोड़ ।।

न बंटेगा जग से जीवन ,झलके झलझल झर्झरीक।
न धनाढ्य कोई होगा , ना ही मांगे कोई  भीख।।
झंझटी झंझार न हो, झर्झरी की बस हो होड ।
तू संभलजा मन न भटका ,सत्यता का पथ न छोड़ ।।

आकाश सेमवाल

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