अंतर्राष्ट्रीय वृद्ध दिवस पर कविता: vriddh diwas poem

मेरे बच्चे थे मेरा अपना मकान था,
आज बूढ़ा हो गया हूँ मैं भी जवान था।

Bujurg diwas

मेरे बच्चे मेरी सुनते कद्र हमेशा करते थे,
गलत कदम ना उठने देता गलत कर्म से डरते थे,
मैं खड़ा हूँ आज यहाँ मेरे बच्चे ना इस क्रम में हो,
मैं भले ही आया लेकिन वो ना वृद्धाश्रम में हो।

दो मुक्तक-

इंसान  इंसानियत पर चालाकी से वार कर देता है,
घर से निकालके इन्हें खुद को अनाथ कर देता है,
खून  का  रिश्ता  खुद  खून  ही  तोड़ता   है   ऐसे,
और  बुढ़ापे  में  भी  इन्हें  बदनाम   कर  देता  है!

अपनी ही शाखाओं के छिपे दर्द होते है,
जो  इन्हें  चोट  दें  वो खुदगर्ज़  होते  हैे,
संस्कार  को   सलीके  से  सौंप  देते  है,
इरादो  से  जवाँ काया से  बुज़ुर्ग होते है।

गीत बुज़ुर्ग पर

Vriddh diwas

खुद  हरे  पत्ते   ही   शाखा   छोड़  देते है,
और  पतंग  बन  उड़के माँझा तोड़ देते है!

संस्कारों  को  देते   बेहतरीन   सलीके  से,
बच्चों को वो लगाके रखते अपने  सीने से,
राह  पे  इनकी  चलके  राह  मोड़  देते  है,
और  पतंग  बन  उड़के माँझा तोड़ देते है!

खुद  हरे  पत्ते   ही   शाखा  छोड़  देते  है,
और  पतंग  बन उड़के  माँझा तोड़ देते है!

काया से बुज़ुर्ग  लेकिन  जवाँ  इरादे  होते,
आँखों पे चश्मा होता नज़रों में ज़माने होते,
टूटके  वो  खुद  ही   रिश्ता  जोड़  देते  है,
खुद  हरे   पत्ते   ही  शाखा   छोड़  देते  है!

खुद   हरे  पत्ते  ही   शाखा   छोड़  देते  है,
और  पतंग  बन उड़के माँझा तोड़  देते  है!

- योगेन्द्र "यश"

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