Breaking

Friday, 7 September 2018

Kavita: marne ka dukh

मरने का दुख

अपने मरने का दुख किसको होता है,
मैं भी सह लेता हूँ तू भी सह लेता है,
सोचो उनके दिल पर क्या बीती होगी,
जिनके युवा बेटों की गर्दन सूली पर होगी,
उनके जीवन मे बस दुखो के रेले होंगे,
जिसने युवा सूतो के शव अपने कंधों पर झेले होंगे,
दुख चाहे जितना हो खुद कट जाता है,
अपने मरने का  ................. ।

कैसे वह सरदार सामने छाती तान खड़ा था,
वीरो में महावीर और शेरो में शेर बड़ा था,
उन गोरो ने सब वीरो को फाँसी का झूला झूला दिया,
भरतवंश के वीरो को मौत की शैय्या सुला दिया
उनके जाने से दुख हम सब को होता है,
अपने मरने का दुख  ............... . ।

Kavita

माँ के आंचल में आसीम वेदना होती है,
अपने लल्ला का रंग देख ओ रोती है,
हो रही जलन है अब उस माँ की छाती में,
रो रो कहती काश तेरे मरने पर आ जाती मैं,
यह मंजर देख के घोर कोलाहल होता है,
अपने मरने का दुख .................... ।

पिता की आंखों से नीर पीर का बहता है,
क्यो छोड़ चले भाई रो रो कर कहता है,
क्यो छोड़ चले हमको करके तुम मनमानी,
भइया बिन तेरे जीना लगता बेईमानी,
रोकर कहती बहना भैया कैसा बंधन रक्षा होता है,
अपने मरने  ................... ।

जो लहू से अपने लाखो गज धरती सिचवा डाली,
जो देश के खातिर चमड़ी अपनी खिंचवा डाली,
ऐसे वीरो के चरणों मे मस्तक खुद झुक जाता है,
जिनकी बदौलत देश आज मुस्काता है,
जब याद शहीदों की आये ये दिल रोता है,
अपने मरने का दुख ही किसको होता है।

- अनुरोध कुमार राजवंश

No comments:

Post a Comment