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Saturday, 8 September 2018

क्या कमी थी: Good poetry

क्या  कमी  थी

क्या  कमी  थी  मेरे  हाथों में
क़ुदरत की खिंची लकीरों का

जो छोड़ा साथ सफर में मेरा
क्या ग़ुनाह था जीवन मे मेरा


तुम  बिन  भटके  रहते  है
मिलता नही ठिकाना मेरा

किस पर करें भरोसा इतना
जचता नही है तुमसा इतना

इस रंग वीरानगी दुनिया में
क्या  तेरा  क्या  अपना  है 

आँखें बंद हुई जिस क्षण
फिर तो यहीं का सपना है

कुछ  सपने  पूरे  होते  है 
कुछ ख़्वाब अधूरे रहते है

करना  जीवन  मे  प्रयत्न ये 
सारा कर्म भोग कर जाना है

न रहे कमी कर्मों की जीवन में
कुछ  ऐसा  कर  के  जाना  है

न रहे फ़र्ज इस जीवन का 
न रहे कर्ज इस  धरती का

न लगे  दोष  इन  हाथों पर 
क़ुदरत की खिंची लकीरों का

 - सतीश चंद्र

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