क्या  कमी  थी

क्या  कमी  थी  मेरे  हाथों में
क़ुदरत की खिंची लकीरों का

जो छोड़ा साथ सफर में मेरा
क्या ग़ुनाह था जीवन मे मेरा


तुम  बिन  भटके  रहते  है
मिलता नही ठिकाना मेरा

किस पर करें भरोसा इतना
जचता नही है तुमसा इतना

इस रंग वीरानगी दुनिया में
क्या  तेरा  क्या  अपना  है 

आँखें बंद हुई जिस क्षण
फिर तो यहीं का सपना है

कुछ  सपने  पूरे  होते  है 
कुछ ख़्वाब अधूरे रहते है

करना  जीवन  मे  प्रयत्न ये 
सारा कर्म भोग कर जाना है

न रहे कमी कर्मों की जीवन में
कुछ  ऐसा  कर  के  जाना  है

न रहे फ़र्ज इस जीवन का 
न रहे कर्ज इस  धरती का

न लगे  दोष  इन  हाथों पर 
क़ुदरत की खिंची लकीरों का

 - सतीश चंद्र

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