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Wednesday, 1 August 2018

काफिया और रदीफ क्या है-kafiya or radif kya hai

काफिया और रदीफ क्या है-kafiya or radif kya hai

गाने से लेकर शायरी, तुकांत कविता, गजल ये सभी लिखने के लिए काफिया और रदीफ की आवश्यकता होती है। बिना काफिया और रदीफ के कभी भी कोई गाना, शायरी और गजल नहीं लिखी जा सकती। इतना ही नहीं हिंदी की कई सारी विधाओं में भी इनका अहम योगदान होता है। ये कहना गलत नहीं कि ऐसी बहुत कम रचनाएं होगी जिसमें इनका यूज नहीं किया जाता। अगर आप भी एक रचनाकार हैं, तो आपको काफिया रदीफ की जानकारी जरूर होनी चाहिए।

kafiya-or-radif-kya-hai

काफिया किसे कहते हैं-kafiya kise kahte hain

काफिया किसी भी शब्द के समान लय देने वाले शब्दों को कहा जाता है। जैसे हम इसे हमारी दो पंक्तियों से समझाने की कोशिश करते हैं-
ज़मीं भी आसमां लगने लगी है,
तू जब से मेरे साथ चलने लगी है...

आप इन पंक्तियों पर घोर करेंगे, तो आपको इन दोनों पंक्तियों में एक लय को कायम रखने वाले शब्द दिखाई दे रहे होंगे जो दोने बोलने में एक जैसे समान लगते हैं। ये दो शब्द लगने और चलने ही काफिया कहलाते हैं। हम काफिया का यूज करके अच्छी से अच्छी और बेहतर से बेहतर रचनाएं लिख सकते हैं। बस आपको काफिया का सही से चुनाव करना आना चाहिए।

रदीफ किसे कहते हैं-radif kise kahte hain

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जिस प्रकार हमने आपके सामने काफिया का जिक्र किया है, उसी तरह रदीफ को समझना और भी आसान है। काफिया के तुरंत बाद आने वाले शब्द या शब्दों के समूह को ही रदीफ कहा जाता है। हम इसे हमारी उन्हीं दो पंक्तियों के माध्यम से आपको समझाना चाहेंगे-

ज़मीं भी आसमां लगने लगी है,
तू जब से मेरे साथ चलने लगी है...

आप देख सकते हैं कि आपके सामने हमारी दो पंक्तियां है जिनमें काफिया के बाद दोनों पंक्ति में कुछ शब्दों का समूह ‘‘लगी है‘‘ आया है, इसे ही हम रदीफ कहते हैं।

अब आपके मन में ये प्रश्न होगा कि ये दोनों पंक्ति में एक जैसा क्यों है, जबकि काफिया तो अलग-अलग हैं। ये भी उलझन हम दूर कर देते हैं कि किसी भी रचना में यदि काफिया एक ही शब्द के लिए जा रहे हैं, तो उनमें कभी भी रदीफ बदला नहीं जाएगा। क्योंकि रदीफ कभी भी बदलता नहीं है केवल काफिया ही बदलता है

एक बात विशेष तौर पर ये भी बता देते हैं कि आप केवल रदीफ से कोई रचना नहीं लिख सकते। लेकिन आप केवल काफिया से जरूर लिख सकते हैं। किसी भी रचना में रदीफ हो और काफिया न हो, तो ये गलत होगा। लेकिन किसी भी रचना में रदीफ नहीं और काफिया ही है, तो ये सही होगा। तो दोस्तों उम्मीद करते हैं आपको हमारी ये पोस्ट पसंद आई होगी। अगर आपको हमारी ये पोस्ट पसंद आई हो और आगे भी आप लेखन से जुड़ी जानकारियां चाहते हैं, तो आप हमारी वेबसाइट को नियमित रूप से देखते रहें। तो दोस्तों आज के लिए इतना ही मिलते हैं अगली ऐसी ही एक पोस्ट के साथ तब तक के लिए लिखते रहिए।

-लेखक योगेन्द्र जीनगर ‘‘यश‘‘

3 comments:

  1. सूरत बुरी है या सीरत बुरी है ।
    जिस्म बुरा है या रूह बुरी है ।।
    खूबसूरत जिस्म के अंदर ।
    बदसूरत रूह-ए-रवानी बुरी है ।।
    जिस्म तो आखिर फ़ानी रहा है ।
    किरदार का कोई सानी नहीं है ।।
    ...................
    एक ग़ज़ल के इन दो मिसरों की आलोचना लिखें

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    1. Bhai ye Sher sahi nahi hai..
      Upar ke misro me sirf radif hai kafia nahi.. Si Aur niche ke do misro me kafia hai radif nahi..

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  2. lekin jimmi bhai, kul milake to dono hain na !!

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