कन्हैया -

अजीब हैं उजालों को शम्मा बुझाते ।।
परिंदों के पर बांँधकर वो उड़ाते ।।

हैं ख़ुद फूल-पत्ती से भी हल्के-फुल्के ,
मगर सर पे ईंट और पत्थर उठाते ।।


Janmashtami status

वो आवाज़ देकर कभी भी न मुझको ,
इशारों से ही क्यों हमेशा बुलाते ?

न पीते हैं पानी को जाकर कुओं पर ,
वो अंगार खा प्यास अपनी बुझाते ।।

वो किस्सा सुनें ग़ौर से ग़ैर का भी 
न रोना किसी को भी अपना सुनाते ।।

कन्हैया हैं ले आड़ माखन की दरअस्ल ,
अरे गोपियों का वो दिल हैं चुराते ।।


-डॉ. हीरालाल प्रजापति

2 Comments

  1. बहुत बहुत शुक्रिया...... मेरी रचना को स्थान दिया ।

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