युवावस्था कि मित्रता

  एक युवा के घर से निकलने पर पहली आवश्यकता एक मित्र कि होती है । मित्र कैसा हो इस बात का चुनाव करने के लिए हमें हमारे साथी की हर प्रकार कि आदतों व गुणों पर गौर करना चाहिये । मित्र चुनते वक्त़ हमें ध्यान रखना चाहिऐ कि हमारे मित्र के आचरण का हमारे चरित्र पर प्रभाव होगा अतः हमारा मित्र ऐसा होना चाहिये जो हमारे लिऐ खजाने , औषध , और‌ माता के समान हो।  जो हमारी हर परिस्थिति मे मदद करे हम कभी  दुखी हो तो दुख से उबारने का काम करे । 


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हमारे उत्तम दृढ़ संकल्पों को साधने मे हमारी मदद करे । हमारे अन्दर जो दोष अवगुण व त्रुटियाँ हो उन्हें बेझिझक दुर करने का प्रयास करे  । केवल प्रयास ही नहीं बल्कि उस दोष को लक्ष्य कर हमें उसके माध्यम से होने वाली हानियों से आगाह करवाए । उस दोष से छुटकारा पाने के तरिके व उपाय हमें  बताये । हमारी छोटी बङी गलतियों को भी  नजरअदांज न करे । स्वयं के प्रति सच्चाई सुनने कि शक्ति रखे । 

हमारी हर बात को अनुसरण करने कि बजाय  हमारी जो गतिविधियों उत्तम व उचित न हो उन्हें करने से रोके । तथा साथ ही स्वंय भी  ऐसी अनुचित गतिविधियों से दुर रहे ।जब‌ हम हतोत्साहित हो तो हमें उत्साहित करे । 


Friendship par lekh

हमारे मित्र मे सही को पहचानने कि और बुराईयां को ठुकराने कि शक्ति हो । जो माता कि तरह धैर्यवान व कोमल हो । हमारे कुमार्ग पर पैर धरते ही सचेत करे । मित्र एक अच्छे भाई कि तरह होना चाहिये  जिसे हम अपना प्रीति पात्र बना सके । 

अगर हमारे मित्र मे ही अच्छे गुण न हो तो वह हमारे पैर मे बन्धि पत्थर कि चक्की के समान होता है जो हमें कभी भी  घृत मे डाल सकता है । हमारी युवा अवस्था एक मिट्टी कि मुर्ति के समान होती है इस अवस्था मे जो हमें जैसी  आकृति देनी चाहे दे सकता है इसलिए हमारी इस अवस्था मे एक सच्चे व अच्छे मित्र का होना जरूरी है । अतः हमें मित्र बड़ी सावधानीपूर्वक बनाना चाहिये।

गोविंद कृष्णा जसनाथी

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