सब रगों में मिल जाये, आकार में ढल जाये,
प्यास में है पानीे एेसा,  ज ीवन मिल जाये।

पानी पर कविता

सागर में खारा जल है,नदियों में पावन,
झरनो में मीठा मीठा, झीलें मनभावन,
अोंस की बूंद फूलों,पर मोती सी बन जाये।            
सब रगों. . . . .  

कहीं पर है बर्फीली चादर, गर्मी से बनता भाप,
बन कर बादल जो बरसे, मिट जाता संताप,         
पानी तू अनमोल है, प्रकृति तुझ बिन चल न पाये।  
सब रगों. . . . . .

पानी कविता

घड़े में तू है सौंधा पानी, अमृत सा बन जाये,
ताँबे के बर्तन का हो तो, रोग विकार मिटाये,
डुबकी लगालो तिरथ जल सब पाप धुल जाये ।     
सब रगों. . . . . .

-नम्रता शर्मा

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