आज हम प्रस्तुत करते हैं हमारे सक्रिय सदस्य रचनाकार पंकज जी देवांगन की रचना। हमें इनकी कविता प्रस्तुत करते हुए हर्ष है और हम इनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हैं-

क्यूँ तुम मुझे अब आजमाने लगे
फ़ासला दिल का क्यों बढ़ाने लगे
अब टिक नही पाते आँसू आखो में
क्यों आखो में बसाकर भुलाने लगे
साथ साथ चलने का वादा किया था
वादा तोड़ क्यों जुल्म ढहाने लगे
वफ़ा का मंज़र सबको पसंद है
फिर क्यों झूठ को बसाने लगे

रास्ते कहाँ आसान हुआ करते है
चल पड़े तो क्यों तुम घबराने लगे
कोशिश हमेशा मेरी नाकाम गई
फिर क्यों एतबार साथ छुड़ाने लगे
साँसों की माला में आपका नाम है
जान छिड़कर क्यों तुम पछताने लगे
सागर है उसे किसी की क्या जरूरत
फिर भी दरिया के लिए राह बनाने लगे
खो जाती है कोई अजीज चीज़ तो
अपनी सुध हम बिसराने लगे

खोने के डर से कहीं नही जाते
चाहत के कहर हम पर बरपाने लगे
छू कर जिस्म के अहसासो को हम
तेरी रंगत को दिल मे सजाने लगे
लहरों की पहचान उसके साहिल है
पास यूँ आकर जी मिचलाने लगे
सनम की बेवफाई का क्या कहने
आखों के नूर को बस समझाने लगे

Heart touching shayari


खोल दिया उसने दिल के ताले
चाबी बन कर अब शरमाने लगे
खोज रहा था कब से आशियाना
उसने दिल के कोने को हटाने लगे
फरियाद करता तो किससे मैं
जिन्हें  चाहा अब वो तड़पाने लगे
विरह की वेदना कितनी दुख देती है
तन्हा छोड़कर हमे जलाने लगे
प्यार के रंग में हम घुलने लगे है
जब दिखी चाहत हाथ पैर चलाने लगे

सूरज की रश्मि कितनी प्रचंड होती है
सुर्ख होठों में जब आँखे मिलाने लगे
दुख के समंदर कितना डूब से गए
जब खोली आँखे जी चुराने लगे
अंधेरा अपनी कालिख़ पोतने को आमादा
जब नज़रे हुए चार तो मुंह छिपाने लगे
ख़्वाब में रेखाएं कहाँ होती है
कल्पनाओं में बस रंग चढ़ाने लगे
कैनवास में ख़ुद की तस्वीर देखी
वीभत्स अक्स आईना बन आने लगे

फूल की दास्तां क्या गुल खिलाती है
जब बने बागबान तो फूल मुरझाने लगे
पत्थर की क्या मुकद्दर होता है
जब गढ़े तो भगवान कहलाने लगे
इंसान कब तक नसीब का रोना रोए
जब उठ खड़ा हुआ तो खुद को जताने लगे
जिंदगी एक पहेली सी बन गयी है
जब कज़ा से टकराई तो समझ आने लगे

ख़ुदा की इबादत करते करते हम
अपनी आदत को कर्म बनाने लगे
लोग कब तक जुल्म करते रहेंगे
खुद की ही चोट जब चढ़े खुद में समाने लगे
भावनाएं किस कदर उठ जाती है
लहरों की भांति वदन गढाने लगे

भाव अपना जमीर खो रहा है
खुद को हरा हुआ अब बताने लगे
"पंकज" याद रखना ये बात सदा
जो साथ दिया वही आज पिंड छुड़ाने लगे

- पंकज देवांगन

1 Comments

  1. देख हिंसाओं के बादल
    किस प्रकार निकलते हैं।
    सूख गयी है नदी-बावड़ी।
    प्रकृति ने गाया जब दीप राग ।
    और भयंकर बन मेघ राग।।
    देख हिंसाओं के बादल
    किस प्रकार निकलते हैं ।
    नष्ट होता जा रहा है जग सारा।
    फूट रहा ज्वालामुखी का फव्वारा ।।
    देख हिंसाओं के बादल
    किस प्रकार निकलते हैं।।
    बिखर गया है सब जन -जीवन।
    दब कर बन जाने को ईंधन।।
    देख हिंसाओं के बादल
    किस प्रकार निकलते हैं।
    सो गया है लल्ला लल्लू।
    है ढूँढता माँ का पल्लू।।
    खो गयी है दूर कहीं
    जो बन चमकीला सितारा।
    है बह रहा हर तरफ
    खून का फव्वारा।।नष्ट होता जा रहा है जग सारा।
    फूट रहा ज्वालामुखी का फव्वारा ।।
    देख हिंसाओं के बादल
    किस प्रकार निकलते हैं।।
    बिखर गया है सब जन -जीवन।
    दब कर बन जाने को ईंधन।।
    देख हिंसाओं के बादल
    किस प्रकार निकलते हैं।
    सो गया है लल्ला लल्लू।
    है ढूँढता माँ का पल्लू।।
    खो गयी है दूर कहीं
    जो बन चमकीला सितारा।
    है बह रहा हर तरफ
    खून का फव्वारा।।

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