कूल दीपक”

बड़ी मन्नत से घर में कूल दीपक अया था,
माँ-बाप के जीवन में, असीम खुशीयाँ लाया था।
पल में समय बित गया, मुन्ने की उम्र छ:माह हो गई,
मम्मी भी अब घुमने फिरने, किटी पार्टी में व्यस्त हो गई।
इकलौता बेटा अब नौकरों के बल पर पलता था,
माँ बाप को घुमने फिरने और बिजनेस से समय न मिलता था।

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देख माँ बाप को जब उनके पास आने को मचलता था,
झट से कोई खिलोना आकर, उसकी पूर्ति करता था।
धीरे धीरे समय बितने लगा, अब वह स्कूल जाने लगा,
घर पर कौन कुछ कहता खुब मोबाईल चलाने लगा।

मन लगाने को उसके एक से एक महगें साजो सामान थे।
पर उनसे क्या सीख रहा था, माँ बाप इससे अंजान थे। 

जैसे जैसे समय बितने लगा, वह पैसो के रगं में रंगने लगा,
दोस्तो के बीच में अब ज्यादा उसका मन रमने लगा।
ड्रग्स शराब अफ़िम अब उसके साथी हो गये थे,
अंजान था कि कितने आत्मघाती हो गये थे।
एक दिन जब वह दिन में घर को आया था,
कामवाली के संग चार वर्ष की बच्ची को पाया था।

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बाई को काम करता देख, बच्ची को कमरे में बुलाया था,
फिर अपनी कामवासना की पूर्ति का घिनौना कृत्य रचाया था।
बच्ची दर्द से चिख उठी और जोर से चिल्लाई थी,
उसकी माँ भागकर आती उससे पहले आवाज़ दबाई थी।
नन्ही जान की ऐसी हालत देख माँ आपा खो रही थी,
क्षत विक्षत बच्ची को गोद में ले बहुत जोर रो रही थी।

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बोली, “बाहर दुनियाँ के डर से हरदम इसको साथ रखा था,
नही पता था, मालिक ने घर में दरिंदा पाल रखा था”।
बहुत इलाज कराया पर बच्ची नहीं बच पाई थी,
कूल के दीपक ने देखो घर में कैसी आग लगाई थी।

बेटे को जेल जाता देख माँ बाप ने आपा खोया था,
यह देख बेटा झट कमरे से अपने खिलौने लाया था।
अचंभित हो कर पुछा उनने, “तू यह क्यो लेकर आया है,”
बोला, “मेरे रोने पर तुमने भी मुझको ऐसे ही बहलाया है”।।  

- नम्रता शर्मा

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