मुसाफिर का मन

मन ये तेरा 
परेशान क्यूँ है,
इस जग से 
बेफिक्र क्यूँ है,
नित नये ख्वाब 
सजा कर 
मन में दबा 
बैठा क्यूँ है।
Upsat

पथ पर नित 
आगे बढ चल
न चंद कांटो से 
तू डर,
मुसीबतों को चीर

तू देख,
बिन अंधकार 
चमकता सितारा 
भी नही है।

ए मुसाफिर
तूँ रूकता क्यूँ है। 
तू रूकता क्यूँ है।

-शालू मिश्रा, नोहर (हनुमानगढ)

2 Comments

  1. यहां पर कविता कीस तरह भेजे।
    क्या ईस कोमेंट्स बोक्स मे भेज सकते है।

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