पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव पड़ने से हमारे देश में अनेक तरह की परम्पराओं का आगमन हुआ है l अप्रैल महीना आते ही लोग उत्सुकता के साथ एक-दूजे को अप्रैल फूल मनाने में लग जाते हैं l इस बात से हम सभी अवगत हैं कि हर एक व्यक्ति की प्रकृति हर व्यक्ति से भिन्न होती है l किसी को मजाक करना अच्छा लगता है तो किसी को बुरा l हर व्यक्ति के रवैये में फर्क होता है l

अप्रैल फूल-मजाक करना या मजाक बनाना:

आज के इस व्यस्तता भरे दौर में भला कौन हँसना और हँसाना नहीं चाहता l हर व्यक्ति मौके की तलाश में रहता है l मैं ये नहीं कहता की किसी से मजाक नहीं की जाए बल्कि एक दृश्य देखने के बाद आप स्वयं मेरे साथ ये मानने लगेंगे कि क्या इस तरह अप्रैल फूल मनाना वाजिब है या नहीं l

जी हाँ! मैं आपके सामने अपने समाज के छिपे हुए एक ऐसे दृश्य का जिक्र करना चाहता हूँ जिसका उद्देश्य भले ही अप्रैल फूल मनाना रहा हो लेकिन कहीं न कहीं इस हरकत द्वारा किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाया गया है l

कुछ व्यापारी अपनी दुकानों के बाहर सड़कों पर एक या दो रूपये के सिक्कों को कुछ इस तरह चिपका देते हैं कि आने-जाने वाले लोगों की नजर उस सिक्के पर पड़े और वो उस सिक्के को उठाये लेकिन सिक्का निकले नहीं l सिक्का उठाते हुए चुपके से उनका फोटो खींचकर सोसियल साइट्स पर वायरल करके अपनी करतूतों का परिचय देना कि किस तरह अप्रैल फूल के अवसर पर जिस रूपये को हम लक्ष्मी मानकर पूजते हैं,उसको जरिया बनाकर किसी गरीब और दु:खी इंसान की भावना को ठेस पहुंचाया है l

स्वाभाविक बात है कि उस राह से गुजरने वाला हर व्यक्ति तो रूपये-पैसों से समृद्ध होगा नहीं कि वो उस सिक्के को न उठाये और यदि हुआ भी,तो कौन भला सड़क पर पड़े पैसे को पांव में आने के लिए वहीं छोड़ देगा क्योंकि ये बात तो कोई जानता नहीं कि सिक्का किसी के द्वारा सड़क पर रखा गया है और किस उद्देश्य से रखा गया है l

एक-एक रूपये को तरसने वाला और भूख की पीड़ा लेकर यदि कोई भटका हुआ उस राह पर पहुंचे तो उस बेबस की भावनाओं को कितनी ठेस पहुंचेगी इस बात से आप स्वयं भी अनभिज्ञ नहीं l मित्रों मैं आपसे निवेदन करके बस इतना कहना चाहता हूँ कि यदि हम किसी गरीब की सहायता उसके तन पर वस्त्र ठककर,उसके पेट की भूख मिटाकर न कर सकें तो इसका भी हमें कोई हक नहीं बनता कि हम उसकी भावनाओं को ठेस पहुंचाकर अपनी हैवानियत का परिचय दे l

पाश्चात्य संस्कृति की बेड़ियों में जकड़े हुए सब अपनी मनमानियों में लगे हैं l खुद इस बात से अनभिज्ञ हैं कि आखिर हम कर क्या रहे हैं l किसी के दुःख को समझना कोई नहीं चाहता l दिल के बोझ को न देख सभी की नजर तिजोरियों पर होती है l व्यक्ति की फटी हुई जेब में और दिल में भरी इंसानियत को भला आजकल कौन देखता है l दिल में भले पत्थर भरे हो पर जेब भारी होनी चाहिए l ऐसी सोच भला इंसान का कहाँ तक साथ देती है l बड़े पदों पर जाकर इंसान ये तक भूल जाता है कि वो अपने किस गरीब दोस्त के हाथों से बनाये नोट्स को पढ़ा करता था l आते-जाते हुए आज वो अपने अहंकार के कारण उसकी दुकान पे बेठता तक नहीं l

अंत में अपने कुछ शब्द कहते हुए मैं अपनी लेखनी को यहीं विराम देना चाहूँगा और फिर मिलूंगा कभी आपसे ऐसे ही विषय पर अपनी लेखनी को लेकर पेश है मेरे कुछ शब्द-

कोई सम्मान करता है कोई अपमान यूँ करता,

कोई पूजे समझ भगवान कोई पांव में रखता,

हुई मनमानियां काफी ये पैसा चीज है ऐसी,

किसी का पेट भरता है कोई इसके बिना मरता

–लेखक योगेन्द्र जीनगर "यश"
                                                                               

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