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Thursday, 6 December 2018

क्या हो तुम कविता

क्या हो तुम कविता

फूलो में सबसे सुंदर गुलाब हो तुम
हूरो के मस्तक का ताज हो तुम
मेरी पूजा हो, अरदास हो तुम
जो जुबां से हटती नही अब,
वो सुरीली राग हो तुम..
क्या लिखूं...की क्या हो तुम!


दिल मे हो तो एहसास हो तुम
जुबा से जो उतरते नही
वो अल्फ़ाज़ हो तुम
मेरे प्रेम गीतों का
एक साज़ हो तुम
जो किसी से मैं कहता नही..
बस वही बात हो तुम..।।
क्या लिखूं, की क्या हो तुम!

सूखे बागों में जैसे
सावन की बहार हो तुम
जो तुम्हे कागज़ों पर उतारू..
तो पूरी किताब हो तुम
पहली दफा का इश्क़ है प्रिये..
जिससे बस अनजान हो तुम
जिसका कभी इज़हार न हुआ मुझसे
हाँ मेरा वो प्यार हो तुम..।

- सागर पाटीदार

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