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Thursday, 20 December 2018

कविता : मन के हालात

कविता : मन के हालात

सुबह-ही-सुबह मोहल्ले में पानी भरने के लिए जाना,
सुबह-ही-सुबह मोहल्ले में पानी भरने के लिए जाना।

फिल्मी गीतों को धार के साथ गुनगुनाना, 
दफ्तर में बैठकर यही सोचते रह जाना।


कि शाम को उस घर में बापस ना जाना पड़े, 
जहाँ माँ खाँसती हुई मिलेगी और मैं दवा नहीं ला पाऊँगा।

बच्चों के टूटे खिलौनाें को कितनी बार जोड़ पाऊँगा,
बीबी की फटी साड़ी में से झाँकेगे सपने, आखिर वही तो है अपने।

भलेई हर दिन बोझ है,
और खुद पर उधार है।

तुझ जैसी भी है,
जिन्दगी , मुझे तुझसे प्यार है।

- अजय सिंह

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