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Saturday, 13 October 2018

गैरों कि कतारों में: कविता

गैरों कि कतारों में

गैरों कि कतारों में ये मेरे दोस्त कैसे!
सुलूक मे तुम्हारी रंग-ए-गिरगिट कैसे!

प्यार की नदियाँ बहती थी आँखों मे!
अब दिल मे जलन की ए बदबू कैसे!


खुशी हो या गम सब हमारा था कभी!
अब ये तेरा और वो मेरा की शर्त कैसे!

साथ-ए-जिंदगी का वादा था तुम्हारा!
पर रिश्ते की गाँठ इतनी कमजोर कैसे!

मंजिल तो हमने तय एक ही थी की!
रास्ते हो गए हमारे यूँ अलग कैसे!

आँखों ने तो सबकुछ बयाँ कर दिया है!
फिर भी लब्ज़ तुम्हारे यूँ खामोश कैसे!


मौसम से तो न था कोई वास्ता तुम्हारा!
फिर आईने का तुम पर ए इल्ज़ाम कैसे!

तुम तो कहते हो चेहरा एक ही है मेरा।
गिरगिटों के साथ तुम्हारी ए तस्वीर कैसे।

अपनों के सिवा न था कोई साथ मेरे!
फिर पीठ पे ए ख़ंजर के निशान कैसे!

लोग कहते है की दोस्त गम छिन लेते है!
'बिलगे' फिर आंखों में तेरे ए समंदर कैसे!

मधुकर बिलगे

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