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Thursday, 11 October 2018

कविता: ढलती हुई शाम

कविता: ढलती हुई शाम 

ढलती हुई शाम कुछ कहती हैं सुनो !
परिन्दे घर की ओर चल पङे हैं देखो !
इन्तज़ार खत्म होने को है, नन्हें परिन्दों का भी,
ढलती हुई शाम कुछ कहती हैं सुनो !


हल्की - हल्की किरणें सूरज की
पङ रही है ,जो मेरे घर की ओर
चल पङे कदम मेरे डूबते सूरज की ओर,
जाती हुई शाम की ओर
ढलती हुई शाम कुछ कहती हैं सुनो !

चहल- पहल बढ रही हैं,
देखने को डूबते हुए सूरज को,
तो एक ओर
देखने को जाती हुई एक और शाम को
ढलती हुई शाम कुछ कहती हैं सुनो !


दिन भर की थकान दूर होने को हैं ,
दिन की चिलचिलाती धूप जा चुकी ।
गरम हवाएँ भी घर की ओर जा चुकी ।
ठण्डी -ठण्डी हवाएँ शाम की अब आ चुकी ।
ढलती हुई शाम कुछ कहती हैं सुनो !

सुबह के बाद इक ऐसा वक्त हैं अब,
जब तुम भी मैं भी
सूरज से आँख मिला सके,
उसे अब अलविदा कह सके,
और फिर कल मिलने को कह सके।
ढलती हुई शाम कुछ कहती हैं सुनो॥

- Sumita kanwar 

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