Breaking

Sunday, 28 October 2018

कंधे पर कविता

कंधे पर कविता

कितना मजबूत था वो कंधा
बुढ़ापे तक हमें उठाये रखा
खुद सोया जमीं पर
हमें सीने पर सुलाये रखा l

Kandha

खड़ा वो नंगे पाँव धूप मे
फूल बन राहों मे खुद को बिछाए रखा
आँच न आने दी हम पर
कवच बना खुद को हम पर छाये रखा l

आज वो कन्धे थक गए
हम बड़े क्या हुए बैठे बैठे पक गए
आज जब वो बुढ़ा हो गया
यूँ निकाल फेके मानो घर का कूड़ा हो गया l

वो फिर भी अपनी कृपा
हम पर बनाये हुए है
हम लाख नालायक हो गए
उनका आशीर्वाद आज भी छाये हुए है l

- Arvi

No comments:

Post a Comment